CBSE Class 10 Hindi (Course A) • Kshitij Part-2 • Prose (Gadya)
पाठ का सारांश (Summary):
यशपाल द्वारा रचित 'लखनवी अंदाज़' मूलतः एक व्यंग्य (Satire) विधा की रचना है। यह व्यंग्य पतनशील सामंती (Feudal) और 'नवाबी' वर्ग पर किया गया है जो अपनी वास्तविकता (Reality) को स्वीकार करने से बचता है और बनावटी (Artificial) जीवन-शैली जीने का ढोंग करता है। इसके साथ ही, इस पाठ के माध्यम से लेखक ने 'नई कहानी' (Nai Kahani movement) के उन साहित्यकारों पर भी प्रहार किया है जो बिना किसी विचार, घटना या पात्र के केवल अपनी सनक से कहानियाँ लिखते हैं। कहानी में एक "नवाब साहब" का वर्णन है जो अपनी शान और 'लखनवी अंदाज़' दिखाने के लिए सजे हुए खीरे (Cucumber) को मात्र सूंघकर ट्रेन की खिड़की से बाहर फेंक देते हैं और डकार लेकर पेट भरने का अभिनय करते हैं।
= अर्थ: यह इस व्यंग्य का सबसे प्रमुख निष्कर्ष है। जिस प्रकार नवाब साहब का खीरे को बिना खाए सूंघकर पेट भरने का दिखावा 'यथार्थ' (Reality) के खिलाफ था, उसी प्रकार 'नई कहानी' के लेखकों का यह सोचना गलत है कि बिना किसी ठोस विषय या घटना (यानी बिना समाज की वास्तविकता को समझे) केवल कल्पनाओं की उड़ान से कोई अच्छी रचना लिखी जा सकती है।
प्रश्न 1: लेखक को नवाब साहब के किन हाव-भावों से लगा कि वे उनसे बातचीत करने के लिए उत्सुक नहीं हैं?
उत्तर: जैसे ही लेखक ट्रेन के सेकंड-क्लास डिब्बे में चढ़े, उन्होंने देखा कि नवाब साहब पालथी मारे आराम से बैठे थे। परंतु लेखक को देखकर नवाब साहब के चेहरे पर असंतोष और झुंझलाहट के भाव आ गए। उन्होंने लेखक की ओर देखा तक नहीं, अपितु मुँह घुमाकर खिड़की के बाहर (प्रकृति की ओर) देखने लगे और लेखक को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया। इन रुखाई भरे हाव-भावों से लेखक समझ गए कि नवाब साहब उनके आने से खुश नहीं थे और बातचीत करने के इच्छुक नहीं थे।
प्रश्न 2: नवाब साहब ने सेकंड-क्लास का टिकट क्यों खरीदा होगा?
उत्तर: नवाब साहब अपनी शानो-शौकत और दिखावे के आदी थे, परंतु असल में उनकी आर्थिक स्थिति कमज़ोर हो चुकी थी। उन्होंने सेकंड-क्लास का टिकट शायद इसलिए खरीदा होगा ताकि वे सस्ते में सफर कर सकें और साथ ही यह भी सोचा होगा कि इस डिब्बे में भीड़ नहीं होगी; तो कोई उन्हें 'खीरा' (जो कि नवाबों की नज़रों में एक बहुत ही साधारण और तुच्छ चीज़ है) खाते हुए नहीं देखेगा। वे एकांत में बिना अपने 'नवाबी' दर्ज़े पर आँच आए, सस्ते फल का मज़ा लेना चाहते थे।
प्रश्न 3: नवाब साहब द्वारा खीरे को सूंघकर खिड़की से बाहर फेंकने का क्या कारण था?
उत्तर: लेखक के आ जाने से नवाब साहब संकोच में पड़ गए थे। वे अपने आपको एक ऊँचे 'रईस खानदान' का साबित करना चाहते थे। जब लेखक ने उनका खीरा खाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया, तो नवाब साहब ने अपना "लखनवी अंदाज़" (नवाबी ठसक) दिखाने का निश्चय किया। उन्होंने लेखक को यह जताना चाहा कि "हम नवाब लोग इस साधारण वस्तु को खाते नहीं, बल्कि सिर्फ इसकी सुगंध लेकर पेट भर लेते हैं।" अपनी झूठी शान और दिखावे (ऐंठ) को बनाए रखने के लिए ही उन्होंने खीरे की फाँकों को बड़ी नज़ाकत से सूंघा और फिर खिड़की से बाहर फेंक दिया।
प्रश्न 4: "लखनवी अंदाज़" कहानी के माध्यम से समाज के किस वर्ग पर व्यंग्य किया गया है?
उत्तर: इस पाठ के माध्यम से लेखक ने समाज के उस सामंती (Feudal) और "नवाबी" वर्ग पर करारा व्यंग्य किया है जो अपनी वास्तविकता (वर्तमान आर्थिक या सामाजिक पतन) को स्वीकार नहीं कर पाता। यह वर्ग अपनी पुरानी शानो-शौकत की झूठी ऐंठ और दिखावे (Show-off) में जीता है। समाज बदल रहा है, पर वे अपने खोखले अभिमान में फँसे रहते हैं। इसके अतिरिक्त, इस रचना के माध्यम से लेखक ने हिंदी साहित्य के उन "नई कहानी लिखने वाले लेखकों" पर भी व्यंग्य किया है जो बिना किसी वास्तविक कथ्य, विचार या पात्र के निरुद्देश्य कहानियाँ लिखने का ढोंग करते हैं।